Saturday, 3 September 2016

वेद और पुराण में भी है मुहम्मद सल्ल. के आने की भविष्यवाणी

वेद और पुराण में भी है मुहम्मद सल्ल. के आने की भविष्यवाणी

शायद आप यह बात जानकर हैरत करें लेकिन सच्चाई यही है कि वेदों और पुराणों में पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. के आगमन से बरसों पहले उनके आने की भविष्यवाणी की गई है।
मुहम्मद सल्ल0 अरब में छठी शताब्दी में पैदा हुए, मगर इससे बहुत पहले उनके आगमन की भविष्यवाणी वेदों में की गई  हैं। महाऋषि व्यास के अठारह पुराणों में से एक पुराण ‘भविष्य पुराण’ हैं। उसका एक श्लोक यह हैं:
‘‘एक दूसरे देश में एक आचार्य अपने मित्रो के साथ आयेंगे। उनका नाम महामद होगा। वे रेगिस्तान क्षेत्र में आयेंगे।     (भविष्य पुराण अ0 323 सू0 5 से 8)
स्पष्ट रूप से इस श्लोक और सूत्र मे नाम और स्थान के संकेत हैं। आने वाले महान पुरूष की अन्य निशानियॉ यह बयान हुई हैं।
‘ पैदाइशी तौर पर उनका खतना किया हुआ होगा। उनके जटा नही होगी। वह दाढ़ी रखे हुए होंगे। गोश्त खायेंगे। अपना संदेश स्पष्ट शब्दो मे जोरदार तरीके से प्रसारित करेंगे। अपने संदेश के मानने वालों को मुसलाई नाम से पुकारेंगे।                       (अध्याय 3 श्लोक 25, सूत्र )
इस श्लोक को ध्यान पूर्वक देखिए। खतने का रिवाज हिंदुओं में नही था। जटा यहॉ धार्मिक निशान था। आने वाले महान पुरूष अर्थात मुहम्मद सल्ल0 के अन्दर ये सभी बाते स्पष्ट रूप से पाई जाती हैं । फिर इस संदेश के मानने वालो के लिए मुसलाई का नाम हैं। यह शब्द मुस्लिम और मुसलमान की ओर संकेत करता है।
 अथर्व वेद अध्याय 20 में हम निम्नलिखित श्लोक देख सकते हैं•
हे भक्तो! इसको ध्यान से सुनो। प्रशंसा किया गया, प्रशंसा किया जाने वाला वह महामहे ऋषि साठ हजार नब्बे लोगो के बीच आयेगा।
मुहम्मद के मायने हैं जिसकी प्रशंसा की गई  हो। आप स0 की पैदाइश के समय मक्का की आबादी साठ हजार थी।
वे बीस नर और मादा ऊटो पर सवारी करेंगे। उनकी प्रशंसा और बड़ा स्वर्ग तक होगी। उस महा ऋषि के सौ सोने के आभूषण होंगे।
ऊट पर सवारी करने वाले महा ऋषि को हम भारत में नही पाते।
अत: यह संकेत मुहम्मद स0 ही की ओर हैं। सौ सोने के आभूषण से अभिप्रेत हबशा की हिजरत में जाने वाले आप सल्ल0 के सौ प्राणोत्सगी मित्र हैं।
  दस मोतियों के हार, तीन सौ अरबी घोड़े , दस हजार गाये उनके यहॉ होगी।
दस मोतियों के हार से संकेत आप स0  के उन दस मित्रों की ओर हैं जिन्हे दुनिया ही मे जन्नत की खुशखबरी दी ग
बद्र की लड़ा  में हिस्सा लेने वाले 313 सहाबा को तीन सौ अरबी घोड़ो की उपमा दी ग हैं। दस हजार गायों से अभिप्रेत यह हैं कि आप सल्ल0 के अनुयायियों की संख्या बहुत अधिक होगी।

 कुरआन मजीद नबी सल्ल0 को ‘जगत के लिए रहमत’ के नाम से याद करता हैं।
 ऋग्वेद मे भी हैं:
रहमत का नाम पाने वाला, प्रशंसा किया हुआ दस हजार साथियों के साथ आएगा।          
                                                                                                          (मंत्र 5 सूत्र 28)
इसी तरह वेद में महामहे और महामद के नाम से भी आप स0 के आगमन का उल्लेख हैं.

पैगम्बर मुहम्मद सल्ल. के बारे में कई भारतीय धर्मग्रंथों में भविष्यवाणी की गई है। इसके लिए आप डॉ. एम.ए. श्रीवास्तव की पुस्तक 'हजरत मुहम्मद और भारतीय धर्मग्रंथ' जरूर पढें।

Friday, 2 September 2016

Napansuk ved raja

Written by brother Vikas Vahist

क्या वेदकाल से ही नपुसकँ है आर्य राजा ~

आर्यो ब्रहाचार्य का भडाँफोड ~

नियोग या सिर्फ भोग ~

अगर हम धार्मिक ग्रथोँ का अध्ययन करते है तो वेदकाल से ही आर्य राजा नपुसँक दिखते है और ब्रहाचार्य का चोला पहने ऋषी भोगी दिखते है ।

ब्रहाचार्य तो सिर्फ एक चौला था
लेकिन ब्रहाचार्य का पालन किसी ने भी नहीँ किया कोई किसी राजा कि पत्नि के साथ नियोग कर रहा है । कोई किसी के साथ ।

और वहीँ आर्य राजाओ को देखा जाए तो वो बेचारे नपुसकँ दिखते धार्मिक ग्रथोँ मे

राजा दशरत 4 पत्नि पुत्र चारो नियोग से । राजा
जनक सिता जी उनकी पुत्रि नहीँ थी बल्कि खेत मे मिली थी जिसका जिकर स्वामी जी ने अपने अमर ग्रथँ सत्यार्थ मे किया है ।

महाभारत कि बात करे तो एक भी विवाह से सतानँ उत्तपन नहीँ हुई जहाँ पाडवोँ कि बात है वो कुतिँ कुवारी थी तभी नियोग कर लिया था ।

ध्रतराष्ट वो भी नियोग से हुए । उनकी शादी हुई गाधारीँ के साथ पर पुत्र नहीँ हुए तभ एक से नियोग किया फिर आगे लिखा है वो 2 वर्ष
तक गर्भवती रही फिर 100 पुत्रोँ का जन्म एक ही बार की डिलीवरी मेँ ।
आगे भिष्म
जिन्हे बडा बहुत बडा ब्रहाचारी कहा जाता है वो भी नियोगी थे । ब्रहाचार्य का पालन किसी ने नहीँ किया ।

ब्रहाचार्य आर्यो का चोला था जैसे हाथी के दातँ खाने के और दिखाने
के और होते है ।

आज आपको ऐसे आर्य मिल जाएगेँ जो नियोग को आपात कालिन स्थिती का उपाय बताते है । की नियोग तो पती के मर जाने पर है ।

आर्यो के दावोँ का भडाफोँड उनके ही स्वामी जी के अगर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश से

सत्यार्थ प्रकाश समुल्लास 4 पृष्ट 102 पर यह भी लिखा है कि जिस स्त्री का पति जीवित है वह दूर देश में रोजगार के लिए गया हो तो उसकी स्त्री तीन वर्ष तक बाट (प्रतिक्षा) देखकर किसी अन्य पुरूष से नियोग
( कुकर्म ) कर के सतानँ कर ले, जब पति घर आये तो नियोग किए पति को त्याग दे तथा उस गैर संतान का गोत्र भी विवाहित पति वाला ही
माना जाएगा।

समिक्षा ~ यहाँ साफ बताया गया है कि अगर किसी औरत का पत्ति जिवित है और अगर वो बाहर गया है रोजगार के लिए तो पत्नि को चाहिए कि किसी गैर मर्द से नियोग (कुकरम ,
बिना विवाह के शारिरिक सबधँ अर्थात जिना गुनाह ) कर ले

इतने गटीया तो अग्रेजोँ के भी नियम नहीँ जितने आर्यो के है ।


(4). जिस पुरूष की पत्नी अप्रिय बोलने वाली हो तो उस पुरूष को चाहिए कि किसी अन्य स्त्री से नियोग कर ले तथा रहे अपनी पत्नी के
साथ ही।

समिक्षा ~ अगर किसी कि पत्नी अप्रिय बोले तो उसे छोडकर किसी दुसरी से नियोग ( कुकरम ) कर ले और रहे उसके साथ ।

कुछ जाहिल नयुज चैनल वाले तलाक " का मजाक उडाते है और इस्लाम को बदनाम करते है । देख लो जाहिलोँ
अगर इस्लाम का कानुन तलाक " ना होता तो ये होता औरतो के साथ "बताइए भला क्या कोई अप्रिय बोलने कि वजह से हि किसी दुसरी
औरत के साथ सबधँ क्यु बनाये जब वो उसके साथ रह सकता है तो फिर उसे उसका हक कयो नहीँ दे सकता क्यो किसी दुसरी औरत से सबधँ बनाये ।

इसी प्रकार जो पुरूष अत्यन्त दुःखदायक हो तो उसकी स्त्री भी दूसरे पुरूष से नियोग से कर
के उसी विवाहित पति के दायभागी संतान कर लेवे।

समिक्षा ~ हद है जाहिलियत की अगर किसी का पत्ति दुखदायक है तो उसकी पत्रनी उसे छोडकर किसी दुसरे पुरुष से नियोग ( कुकरम) क्यो करे ।



इतना ही नहीँ सत्यार्थ प्रकाश मे स्वामी जी ने ये तक फरमाया है की अगर कीसी कि पत्नी गर्भवती हो और पति से ना रहा जाए तो किसी दुसरी औरत से नियोग कर ले "

स्वामी जी ने आर्यो औरतो को 11 मर्दो और मर्दो को 11 औरतोँ तक नियोग (कुकरम) करने
कि छुट दी है ।

समिक्षा ~ इन बातो के बाद नियोग के
आपातकालिन होने का तो सवाल ही नहीँ उठता और दुसरी तरफ ब्रहाचार्य के दावे का भी भडाँफोड हो जाता है । कयोकिँ अगर पतनी के गभवर्ती होने तक ही अगर ब्रहाचार्य का पालन नहीँ किया जाए तो कैसा ब्रहाचार्य ।
ये ब्रहाचार्य सिर्फ दिखावा है जैसे हाथी के दातँ खाने के और दिखाने के और होते है ।

अब आर्यो के ही धार्मिक ग्रथोँ से नियोग (कुकरम , बिना विवाह शारिरिक सबधँ ,
गुनाह ) के प्रमाण देखीये ~

रामायण/ महाभारत/स्मृति में नियोग के प्रमाण

व्यासजी का काशिराज की पुत्री
अम्बालिका से नियोग- महाभारत आदि पर्व अ 106/6
वन में बारिचर ने युधिस्टर से कहा- में
तेरा धर्म नामक पिता- उत्पन्न करने वाला जनक हूँ- महाभारत वन पर्व 314/6


उस राजा बलि ने पुन: ऋषि को प्रसन्न किया और अपनी भार्या सुदेष्णा को उसके पास फिर भेजा- महाभारत आदि पर्व अ 104 कोई गुणवान ब्राह्मण धन देकर बुलाया जाये जो
विचित्र वीर्य की स्त्रियों में संतान उत्पन्न करे- महाभारत आदि पर्व 104/2

उत्तम देवर से आपातकाल में पुरुष पुत्र की इच्छा करते हैं-
महाभारत आदि पर्व 120/26
परशुराम द्वारा लोक के क्षत्रिय रहित होने पर वेदज्ञ ब्राह्मणों ने क्षत्रानियों में संतान उत्पन्न की- महाभारत आदि पर्व 103/10

पांडु कुंती से- हे कल्याणी अब तू किसी बड़े ब्राह्मण से संतान उत्पन्न करने का प्रयत्न कर- महाभारत
आदि पर्व 120/28

सूर्ष ने कुंती से कहा- तू
मुझसे भय छोड़कर प्रसंग कर- महाभारत आदि
पर्व 111/13

किसी कुलीन ब्राह्मण को
बुलाकर पत्नी का नियोग करा दो, इनमे कोई
दोष नहीं हैं-

सूर्य ने कुंती से कहा-भय मत करो संग करो- महाभारत अ। पर्व 111/13

वह तू केसरी का पुत्र क्षेत्रज नियोग से उत्पन्न बड़ा पराकर्मी – वाल्मीकि रामायण किष कांड 66/28

मरुत ने अंजना से नियोग कर हनुमान को उत्पन्न किया – वाल्मीकि रामायण किष कांड 66/15

जिसका पति मर गया हैं-वह 6 महीने बाद पिता व भाई नियोग करा दे- वशिष्ट स्मृति 17/486

किन्ही का मत हैं की देवर को छोड़कर अन्य से नियोग न करे- गौतम स्मृति 18
जिसका पति विदेश गया हो तो वह नियोग कर ले- नारद स्मृति श्लोक 98/99/100

देवर विधवा से नियोग करे- मनु स्मृति 9/62

आपातकाल में नियोग भी गौण हैं- मनु 9/58

नियोग संतान के लोभ के लिए ही किया जाना चाहिए- ब्राह्मण सर्वस्व पृष्ट 233 यदि राजा वृद्ध
हो गया या बीमार रहता हो तो अपने मातृकुल तथा किसी अन्य गुणवान सामंत से अपनी भार्या में नियोग द्वारा पुत्र उत्पन्न करा ले- कौटिलीय शास्त्र 1/17/52

जब कई भाई संग रहते हो और उनमें से एक निपुत्र मर जाये तो उसकी स्त्री का ब्याह पर गोत्री से न किया जाये-उसके पति का भाई उसके पास जाकर उसे अपनी स्त्री कर ले –
व्यवस्था विवरण 25/5-10

यदि देवर नियोग से इंकार करे तो भावज उसके मुह पर थूके और जूते उसके पाव से उतारे- व्यवस्था 25/2

आर्य राजा नपुसकँ थे और ब्रहाचार्य कहलाने वाले भोगी थे ।

Visit।। truthabouthinduism.wordpress.com

Wednesday, 31 August 2016

आर्य समाज का पर्दाफाश

 शरणम in आर्यसमाज एवं नास्तिको का पर्दाफाशनास्तिको एवं आर्यसमाज का पर्दाफाश 

वेदों के अर्थ का अनर्थ करने वाले तीन मूल कारक हुए हैं जिनके कारण आर्य समाज का निर्माण हुआ!!!
1. मैक्स म्युलर (1823-1900)
2. दयानंद सरस्वती (1824-1883)
3. राल्फ टी एच ग्रिफ्थ (1826-1906)
दयानंद का जन्म ब्राहमण परिवार में हुआ अर्थात पिताजी सवर्ण ज्ञानी थे वेदों का ज्ञान भी होगा या पुराणों का किन्तु वे हिन्दू थे और वे मंदिर में पूजा किया करते थे। लेकिन दयानंद ने 1838 में मात्र 15 साल की उम्र में शिवरात्रि पर देखा कि शंकर जी की मूर्ति के पास रखे प्रसाद को एक चूहा खा रहा है लेकिन शंकर जी अपने प्रसाद की भी रक्षा नहीं कर सके इसलिए दयानंद को लगा कि जो शंकर अपने चढ़ाए प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वो विश्व की रक्षा कैसे करेगा अर्थात दयानंद ने निर्णय लिया कि शंकर जी भगवान नहीं हैं और तब से शंकर जी की पूजा करनी बंद कर दी और अपने ही पिता के साथ बहस की और तर्क कुतर्क के साथ ये निर्णय लिया कि हमें ऐसे असहाय ईश्वर की पूजा नहीं करनी चाहिए। यहाँ से मूर्ति पूजा का विरोध आरम्भ हुआ।
दयानंद सरस्वती का असली नाम मूलशंकर था, शंकर से विरोध के कारण दयानंद ने अपना नाम भी बदल कर दयानंद सरस्वती रख लिया।
दयानंद पूरी तरह से नास्तिक हो चुके थे ईश्वर में या ईश्वर के किसी अवतार में कोई विश्वास ही नहीं रह गया। यहाँ तक कि अपने पिता को भी गलत साबित करने के लिए उनसे कई बार बहस की। दयानंद के इस व्यक्तित्व और नास्तिकता के कारण माता पिता चिंता में रहने लगे थे।
कुछ समय पश्चात अपनी छोटी बहन और चाचा की असमयिक मृत्यु के कारण मानसिक तौर पर जन्म और मृत्यु के विषय को गंभीरता से लेते हुए ऐसे ऐसे प्रश्न करने लगे जिसके जवाब पिता के पास भी नहीं थे और न ही किसी अन्य के पास थे। जैसे कि उनको मरने से न बचाने का कारण मृत्यु टालने के उपाय आदि। दयानंद की इस स्थिति के कारण माता पिता ने निर्णय किया कि अब दयानंद का विवाह करा देना चाहिए शायद कुछ सोच में अंतर आये। लेकिन दयानंद को अपनी सोच की खोज विवाह से ज्यादा उचित लग रही थी। इसलिए 1846 में जब उनकी उम्र 23 साल की थी घर छोड़ दिया। आर्य समाजी कहते हैं कि कम उम्र में विवाह का निर्णय लिया था पिता ने किन्तु सत्य तो ये है कि 23 साल की उम्र कम नहीं होती आज के समय के अनुसार भी विवाह के लिए उत्तम मानी जाती है।
घर से निकलकर कई जगहों पर यात्रा की और यात्रा करते हुए वह गुरु विरजानन्द के पास पहुंचे। गुरुवर ने उन्हें वेद-वेदांग का अध्ययन कराया। गुरु दक्षिणा में उन्होंने मांगा-विद्या को सफल कर दिखाओ, परोपकार करो, सत्य शास्त्रों का उद्धार करो, मत मतांतरों की अविद्या को मिटाओ, वेद के प्रकाश से इस अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करो, वैदिक धर्म का आलोक सर्वत्र विकीर्ण करो। परंतु गुरुवार बुद्धि में बदलाव न कर पाए और दयानंद ने पूजा पाठ का विरोध करना पुनः आरम्भ कर दिया। गुरु ने कहा कि मत मतांतरों की अविद्या को मिटाओ किन्तु उन्होंने उनकी विद्या ज्ञान ईश्वर भक्ति को मिटाना आरम्भ कर दिया।
कई जगहों पर ईश्वर की पूजा का विरोध किया और पूजा पाठ को पाखण्ड बताया और लोगों को पूजा पाठ से रोकने हेतु प्रयास किया। बहुत से नास्तिक लोग दयानंद के साथ हो लिए और सभी नास्तिकों ने अपना एक दल बनाया। 1866 में हरिद्वार पहुंचकर कुंभ के अवसर पर पाखण्ड खण्डिनी पताका फहराई। गंगा स्नान आदि जैसे कर्मकांड भी पाखण्ड बताकर विरोध किया और लोगों को पूजा पाठ से रोका।
[वेदों को छोड़ कर कोई अन्य धर्मग्रन्थ प्रमाण नहीं है। रामायण,महाभारत गीता पुराण आदि सारे धर्म ग्रन्थ नहीं हैं।] – इस का प्रचार करने के लिए दयानंद ने सारे देश का दौरा करना प्रारंभ किया। ये समय था जब हमारे देश में संस्कृत भाषा नाम मात्र को ही थी। वे हिंदी भाषा नहीं बोलते बल्कि संस्कृत में तीव्र प्रवाह से बोलते थे। इस कारण लोगों को कुछ ज्यादा ही ज्ञानी लगते थे। साथ ही वे तर्क लगाने में बहुत तेज थे या कहें कि कुछ ज्यादा ही नास्तिकता के कारण तर्क कुतर्क कुछ ज्यादा ही करते थे और सभी जानते हैं कि कुतर्कों का जवाब नहीं होता।
संस्कृत ही बोलने के कारण बहुत कम लोग उनकी बात समझते थे अज्ञानी लोग उन्हें संस्कृत में तेज बोलने के कारण महाज्ञानी समझते थे। लेकिन उनकी बात का मूल नहीं समझ पाते थे। इसलिए उन्हें किसी ने हिंदी में लोगों से बात करने की सलाह दी क्योंकि कलकत्ता बम्बई आदि जिन स्थानों पर दयानंद जाते थे वहां संस्कृत के लोग नहीं बल्कि वहां की क्षेत्रीय भाषा वाले लोग अधिक होते थे जैसे कि कलकत्ता में बंगाली मुम्बई में मराठी भाषा जिनमे इतना अंतर है कि दोनों आपस में भी एक दुसरे की बात नहीं समझ सकते। इस कारण बहुत से लोग जिनके आगे तर्क कुतर्क करके दयानंद खुद और उनके अंधभक्त उनको महाविद्वान समझने लगे किन्तु फिर भी लोगों को कलकत्ता में एकमत नहीं कर सके दाल न गलने के कारण मुम्बई आ गए। इसके पश्चात् दयानंद ने हिंदी भाषा का उपयोग आरम्भ किया।
मुम्बई आकर दयानंद ने 1875 में अपनी सत्यार्थ प्रकाश किताब हिंदी में लिखी और आर्य समाज की स्थापना की।
मुम्बई में उनके साथ प्रार्थना समाज वालों ने भी विचार-विमर्श किया। किन्तु यह समाज तो ब्राह्मो समाज का ही मुम्बई संस्करण था। अतएव स्वामी जी से इस समाज के लोग भी एकमत नहीं हो सके। तब दयानंद यहाँ भी अपनी दाल न गलते देखकर दिल्ली प्रस्थान कर दिए।
तीन वर्ष तक मुम्बई में प्रचार में असफल होने पर मुंबई से लौट कर 1878 में दयानंद इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) आए। वहां उन्होंने सत्यानुसन्धान के लिए ईसाई, मुसलमान और हिन्दू पण्डितों की एक सभा बुलायी। किन्तु दो दिनों के विचार-विमर्श के बाद भी लोग किसी निष्कर्ष पर नहीं आ सके। यहाँ भी दयानंद किसी को एकमत नहीं कर पाए।
इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) से स्वामी जी पंजाब गए। पंजाब में उनके प्रति बहुत उत्साह जाग्रत हुआ और सारे प्रान्त में आर्यसमाज की शाखाएं खुलने लगीं। तभी से पंजाब आर्यसमाजियों का प्रधान गढ़ रहा है।
दयानंद ये भी समझ गए कि जीव कर्म करने में स्वतन्त्र हैं तथा फल भोगने में परतन्त्र हैं। जीवन मृत्यु किसी के वश में नहीं है। दयानन्द सभी धर्मानुयायियों को एक मञ्च पर लाकर एकता स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील थे किन्तु भाव केवल सभी के पूजा पाठ कर्म कांडों को अन्धविश्वास और पाखण्ड बताकर केवल अपनी सोच को ही उनपर सवार करने से था।
विश्व भर के वेदों के विद्वान जो वेद ज्ञान के प्रवाह से वेदमंत्रों से ईश्वर की पूजा पाठ किया करते थे दयानंद अपनी 23 वर्ष की उम्र में घर से निकलकर भटक कर १८५७ की क्रान्ति के दो वर्ष बाद स्वामी जी ने स्वामी विरजानन्द को अपना गुरु बनाया और उनसे दीक्षा ली। स्वामी विरजानन्द के आश्रम में रहकर उन्होंने वेदों का अध्ययन किया। 1859 में 36 वर्ष की आयु में वेदज्ञान प्राप्त करके भी अपनी मानसिकता नहीं बदल पाए और दयानंद की यही पूजा पाठ को पाखंड कहकर विरोध करने की सोच सदैव हावी रही।
सदैव पूजा पाठ कर्म कांडों का ही विरोध किया। लोगों को पूजा पाठ से रोकने का प्रयास किया।
इस सभी के बीच में एक बात ध्यान देने वाली है कि दयानंदी वंशज कहते हैं कि दयानंद ने 23 वर्ष में वेद भाष्य लिखे लेकिन सत्य ये है कि इस समय वे स्वयं अपने गुरु के पास पाणिनी व्याकरण, पातंजल-योगसूत्र तथा वेद-वेदांग का अध्ययन किया। संस्कृत को इस प्रकार उत्तम प्रकार से सीखने में कई साल लगे केवल शिक्षा प्राप्त करने में न कि अपना अध्ययन करने में।
मैक्स म्युलर ने अपनी प्रति 1874 में प्रदर्शित की इसके एक वर्ष पश्चात दयानंद ने अपन वेद भाष्य प्रकाशित किया!!!
मैक्स म्युलर और दयानंद की वेद भाष्य्करण में कुछ समानताएं हैं जो बाकी वेद ग्रंथों से समानता नहीं रखतीं। और इसके बाद टी एच ग्रिफ्थ ने भी वेद भाष्य को लिखा जो कि उन्होंने स्वयं ही कहा है कि वो मैक्स म्युलर से प्रेरित है।
इन तीनों के भाष्य में सभी/ज्यादातर मंत्र संख्या और उनका अर्थ एक सामान है। यह संभव है कि दयानंद ने मैक्स म्युलर का वेद भाष्य पढ़ा और उसको अपने अनुसार हिंदी में लिखा जो कि आज दयानंद वेद नाम से प्रचलित है। किन्तु यह मूल वेद प्रति नहीं है बल्कि केवल अर्थ का अनर्थ है। जिसमे कई मंत्रों को आधा अधुरा करके लिखा गया है। जिससे अर्थ का समूल नहीं व्यक्त होता बल्कि अलग ही प्रकार से अर्थ को दर्शाने का प्रयास होता है। कई मंत्र ऐसे लिखे गए हैं जो इनके वेद भाष्यों में हैं वो अन्य वेद ग्रंथों में नहीं हैं।
आप कोई मंत्र का संख्या काण्ड अध्याय भी दयानंद वंशजों से पूछ लें तो ये अपनी मानसिकता पर आ जाते हैं किन्तु सही जवाब नहीं देते। क्योंकि ये स्वयं भी जानते हैं कि ये जो दयानंद कृत पुस्तकें पढ़ते हैं वे वेद नहीं हैं। केवल छलावा हैं लोगों को वेदों के नाम पर अपनी शिक्षा देने का और अपनी सोच को वेदों के अनुसार न ढालकर लोगों में अपनी सोच के अनुसार वेद ज्ञान को ढाल दिया है। अपने अनुसार इन्होने अर्थ बना रखे हैं अपने अनुसार उनके मंत्र संख्या तय कर दिए!!!
ये जानकारी है कि किसने कब लिखा और किसने कब ये देखिये।
मैक्स म्युलर ने 1874 में वेद लिखा। जिसके 26 साल बाद मृत्यु को प्राप्त हुए।
दयानंद ने 1875 में सत्यार्थ प्रकाश लिखी जिसके आठ साल बाद मृत्यु को प्राप्त हुए।
राल्फ टी एच ग्रिफ्थ ने कुछ कुछ ही साल में सारे वेदों को ट्रांसलेट कर दिया! और अंतिम ट्रांसलेशन के 7 साल बाद मृत्यु को प्राप्त हुए।
Hymns of the Rigveda (published 1889) इसके कुल 4 साल में ही सामवेद का पूर्ण अध्ययन और ट्रांसलेशन!!!
Hymns of the Samaveda (published 1893) इसके कुल तीन साल में ही अथर्ववेद का पूर्ण ट्रांसलेशन!!!!!
Hymns of the Atharvaveda (published 1896) इसके बाद तीन साल में ही यजुर्वेद का ट्रांसलेशन!!!!
The Texts of the Yajurveda (published 1899)
सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि ये ख्याल सबसे पहले लिखने वाले मैक्स म्युलर और अंत में लिखने वाले राल्फ टी एच ग्रिफ्थ के भाष्य अपने आप में एक सबूत हैं कि इनके मध्य में लिखा गया दयानंद का भाष्य भी इन्हीं से प्रेरित था न कि किसी और से। ये सत्य ज्ञान नहीं बल्कि अंग्रेजों की वो सोच थी जिसपर अंग्रेज हमें चलाना चाहते थे ताकि भारत से पूजा पाठ धार्मिक कर्म काण्ड बंद हों और यही बात दयानंद की सोच में भी थी कि “जो ईश्वर अपने चढ़ाए प्रसाद की रक्षा नहीं कर सकता वो विश्व की रक्षा कैसे करेगा” तो यहाँ दयानंद को अपने भाष्य लिखने के लिए अंग्रेजों से प्रेरणा मिली जिसके कारण आज तक वेदों के अर्थ का अनर्थ होता आ रहा है।
जाने कब तक ऐसे ही ईसाइयों यहूदियों और इस्लामियों के बदले गए भाष्यों को पढ़ते रहेंगे हम???
चाहे कोई भी अन्य सम्प्रदाय हो सभी हमें हमारे पूजा पाठ से दूर करना चाहते हैं और अनेक प्रकार के प्रयास करते हैं। हमें समझना चाहिए।

वेद ईश्वर प्रदत्त यानी दी हुई है

कहते है वेद ईश्वर प्रदत यानि दी हुई है !
किस तरह से दी एक एक अलग ही सवाल पैदा करता है कयूकि देने की प्रक्रिया ईश्वर ने नहीं बताई , विद्द्वान कहते है की श्रुति यानि बोल के दिया और ऋषियो ने यद् कर लिया ,और वेसे ही जबानी आगे बढ़ाते रहे !
यहाँ पे सवाल पैदा होता है की ईश्वर ने जैसे दिया क्या उसी प्रकार ऋषियो ने भी आगे बढ़ाया शब्द by शब्द ?
क्या इस सम्भव है , आज एक विद्द्वान जब कोई भले ही ओ  उसकी लिखी हुई हे केउ न हो ओ उसे शब्द के शब्द नहीं पढ़ सकता जरूर कुछ शब्द इधर उधर होना सम्भव है ?
वेदों के मामले में भी ऐसा ही हुआ जिसके कारन आज हजारो बिरोधाभास पाया जाता है वेदों में!
क्या वैदिक ईश्वर को इस बात का ज्ञान नहीं था ?
आज वेदों की लिखित किताब कोई लिपि नहीं मिलती है जो ये बात साबित करे की असली वेद कौन सा है , अगर वैदिक ईश्वर ने इस बात का ज्ञान ऋषियो को दिया होता तो आज एक असली किताब होती , आज असली  किताब  न होने के कारन लोग अपने मन मुताबिक उसका अनुवाद किया और उसे ही सत्य माना , जैसे आर्य समाज का अनुवाद हिन्दू समाज के अनुवाद से नहीं मिलता और हिन्दू का अंग्रेजो के!
जिसके कारन आज हजारो बुराइय फैली हुई है !
आज ऋग्वेद का पहला मंत्र पढ़ा तो एक सवाल पैदा हुआ की जो वैदिक ईश्वर सबका मालिक बताता है क्या ओ भी किसी की स्तुति वंदना इबादत कर सकता है ?
ऋग्वेद मंडल १-सूक्त १ मंत्र १= हम अग्नि देव की स्तुति करते है (कैसे अग्निदेव )जो यज्ञ (श्रेष्ठतम पारमार्थिक कर्म )के पुरोहित ( आगे बढाने वाले ) देवता अनुमोदन देने वाले ) शृत्विज ( समयनाकूल यज्ञ का सम्मपदं करने वाले )होता (देवो का आह्वाहन करने वाले ) और याजको को रत्नों से ( यज्ञ के लाभो से )बिभूषित करने वाले है !